अकाल मृत्यु और बीमारी का कारण भ्रष्ट चिंतन

स्वस्थ शरीर और दीर्घजीवन का संबंध साधारणतया खान-पान, व्यायाम आदि से माना जाता है, पर वस्तुतः समग्र आरोग्य मनुष्य की मनःस्थिति पर आधारित है।

जो मन से स्वस्थ है वह शरीर से भी स्वस्थ रह सकता है। यदि मनःक्षेत्र में उद्वेग और आवेश भरे हुए हैं तो रोग अकारण ही उत्पन्न होते रहेंगे और उनका निवारण पौष्टिक आहार एवं चिकित्सा उपचार से भी संभव न हो सकेगा।

अकाल मृत्यु और बीमारी का कारण भ्रष्ट चिंतन

यदि मन स्वस्थ हो तो बाह्य कारणों से उत्पन हुई रुग्णता अधिक समय न ठहर सकेगी उसका निराकरण जल्दी ही हो जाएगा, शरीर संरचना में वे विशेषताएं भरी पड़ी हैं जिनके द्वारा सामान्य स्तर के रोगों का समाधान स्वयंमेव होता रहे।

मन में भरी दुर्भावनाएं एवं दुष्प्रवृत्तियाँ मात्र मस्तिष्क तक सीमित नहीं रहती उनकी प्रतिक्रिया ज्ञान तंतुओं के माध्यम से शरीर के अंग अवयवों तक निरंतर पहुंचती हैं। इस अन्तर्ग्रही विष को शरीर संरचना भी दूर नहीं कर सकती। संवेदनाएं तो प्रकृति को ढालती हैं, मनोविकार धीरे-धीरे शरीर के समस्त अंगों को अपने दुष्प्रभाव से प्रभावित करते चले जाते हैं और उनका परिणाम शारीरिक रोगों के रूप में सामने आता है। निरोग और दीर्घजीवी बनने के लिए मनःक्षेत्र को पवित्र और प्रगतिशील बनाने की अपरिहार्य आवश्यकता है।

योगवशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ और काकभुसुंडि जी के संवाद का एक रोचक कथा प्रसंग आता है। वशिष्ठ जी पूछते हैं — हे काकभुसुंडि आप इतने काल तक दीर्घजीवी और युवा किस कारण रहे हैं।

इसके उत्तर में काकभुसुंडि कहते है :-

  • मैं सदा आत्म-भाव में तन्मय रहता हूँ।
  • मनोरथों में शक्ति नष्ट नहीं करता।
  • चिंता और विषाद में नहीं फँसता।
  • भविष्य के लिए आशंकाएं नहीं करता।
  • मन को आवेशग्रस्त नहीं होने देता।
  • सबको समान मानता हूँ।
  • मोह और प्रमाद से दूर रहता हूँ।
  • बीती दुर्घटनाओं से दुखित नहीं रहता।
  • दूसरों के सुख दुख में ही सुखी-दुखी होता हूँ। प्राणिमात्र के प्रति सुहृद सहायक रहता हूँ।
  • विपत्ति में न धैर्य खोता हूँ और न संपत्ति से उन्मत्त बनता हूँ।

यह मेरे दीर्घजीवन तथा अक्षययौवन का कारण है।

अकाल मृत्यु और रुग्णता का आधार शास्त्रकारों न मानसिक असंतुलन को बताया है और कहा है जिसे दीर्घजीवन एवं समय आरोग्य अपेक्षित हो उन्हें अपने चिंतन और चरित्र को परिष्कृत बनाने का पूरा-पूरा प्रयास करना चाहिए। इस संदर्भ में अभिवचन इस प्रकार हैं —

मृत्यो न किंमच्छक्यं स्त्वमेको मारयितु बलात्।
मारणीयस्य कर्माणि तत्कर्तुणीति नेतरत्।।

अर्थ : हे मृत्यु तू स्वयं अपनी शक्ति से किसी भी मनुष्य को नहीं मार सकती। लोग किसी दूसरे कारण से नहीं, अपने ही कर्मों से मरते हैं।

Credit : अखंड ज्योति पत्रिका

इस पोस्ट को अपने दोस्तो के साथ फेसबुक, व्हाट्सएप्प पर शेयर करे।

ये भी पढ़े :

You May Also Like

About the Author: Himanshu Kumar

Hellow friends, welcome to my blog NewFeatureBlog. I am Himanshu Kumar, a part time blogger from Bihar, India. Here at NewFeatureBlog I write about Blogging, Social media, WordPress and Making Money Online etc.

Leave a Reply

Your e-mail address will not be published. Required fields are marked *