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विक्षोभ मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता



भूत-प्रेतों के अस्तित्व पर कई लोग विश्वास करते हैं और कई नहीं भी करते हैं | यह सच है कि अनेक बार सामान्य घटनाओं को भी भूत-प्रेत की लीला समझा जाता है और अनेक सम्बन्ध में अतिरंजति कल्पनाएं (imagines) की जाती हैं |

भूत-प्रेतों से सम्बंधित अधिकांश मामलों के मूल में अंधविश्वास (superstition), धोखाधड़ी और अज्ञान ही कारण होते हैं, पर यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि भूत-प्रेतों का अस्तित्व है और वे कई तरह से अपने अस्तित्व का परिचय देते हैं |

कौन-सी घटना से भूत-प्रेतों का अस्तित्व सिद्ध होता है और कौन-सी बातें मात्र अन्धविश्वास हैं, यह भेद करना कठिन है | किन्तु परामनोविज्ञान (parapsychology) की शोधों के अनुसार अब यह शास्त्रीय मान्यता पुष्ट हो चुकी है कि मरने के बाद और जन्म लेने के पूर्व जीव कुछ समय तक अशरीरी अवस्था (bodiless state) में रहता है |


विक्षोभ मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता

कुछ शांत आत्माएं इस अवस्था में चुपचाप रहती हैं और अपने उपयुक्त गर्भ (suitable foetus) का चुनाव करने के लिए प्रतीक्षा करती रहती हैं | किन्तु कई विक्षुब्ध आत्माएं (disturbing spirits) अशरीरी अवस्था में भी अपने जीवन काल की मनःस्थिति (emotion) का परिचय देती रहती हैं |

भूत-प्रेतों के अस्तित्व संबंधी प्रचलित कथा-गाथाओं के सम्बन्ध में यह तथ्य सदा ही सामने आया है कि जो व्यक्ति मरते समय अत्यधिक आवेश में रहे हैं, उन्होंने प्रेत कलेवर में उसी मनःस्थिति का परिचय दिया है |

जैसे धन या मकान से अत्यधिक लगाव रखने वाला व्यक्ति मरते समय उन वस्तुओं से अत्यधिक मोह प्रकट करते हुए विलग हुए हैं तो उनका प्रेत उन्हीं स्थानों के इर्द-गिर्द भटकता रहता हैं | जमीन में गढ़े हुए धन की उन्होंने चौकीदारी की है और यदि किसी ने उसे निकाला, भोगा या निकालने का प्रयास किया है तो उसको तरह-तरह के त्रास दिए हैं |


घृणा और रोष की स्थिति में मरने वाले अक्सर अपने प्रतिपक्षी को कष्ट देते रहे हैं | इस तरह की एक घटना का विवरण नाइजीरिया के एक अंग्रेज अफसर फ्रेंक हाइब्स ने प्रकाशित किया था | अफ्रीका का यह देश किसी समय अंग्रेजों का उपनिवेश (colonised) था | अब यों वहां आजादी है, पर प्रभुत्व वहां स्थाई रूप से बसे हुए गोरों की ही हैं, फ्रेंक हाइब्स भी वहां बसे हुए अंग्रेजों में से ही हैं | एक बार वह किसी काम से 'इसुइंगु' नामक देहाती क्षेत्र में गया | वहां एक पुराना और टूटा-फूटा डाक बंगला था | फ्रेंक हाइब्स ने उसी डाकबंगले में ठहरने का निश्चय किया |

उसी क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों ने फ्रेंक हाइब्स को बताया कि इस बंगले में प्रेत रहते हैं इसलिए वहां न ठहरें | अफसर उनकी बातों पर हँसता रहा | उस बंगले में काफी दिनों से शायद कोई नहीं था, इसलिए काफी धुल, गर्द और कचरा जमा हो गया था | फ्रेंक ने मजदूरों से उसे साफ करवाया | मजदूरों ने बंगले की सफाई कर दी, ठहरने और खाने-पीने के साधन जुटा दिए, पर जब उनसे वहां रात को रुकने के लिए कहा गया तो कोई भी इसके लिए तैयार नहीं हुआ | निदान फ्रेंक को अकेले ही वहां ठहरना पड़ा |

आधी रात गए तक तो कोई विशेष बात नहीं हुई | पर रात के 12 बजे बाद फ्रेंक को लगा की कोई उसका बिस्तर खींच रहा है | उठकर देखा तो कोई नजर नहीं आया किन्तु फ्रेंक ने अनुभव किया कि वहां बहुत तेज बदबू (sharp smell) फैली हुई है | इतने में हवा का एक तेज झोंक आया और बंगले की खिड़कियाँ जोरों से खड़-खड़ाने लगीं, मेज पर रखी चाय की प्लेटें जमीन पर गिर पड़ीं | फ्रेंक ने इन बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया |

किन्तु थोड़ी देर बाद ही फ्रेंक को बाहर किसी के भारी पैरों से चलने की आवाज सुनाई दी | उन्होंने बाहर निकलकर देखा तो प्रतीत हुआ कि कोई छाया जैसी आकृति बरामदे में टहल रही है | फ्रेंक ने आवाज दी, पर कोई उत्तर नहीं मिला | इस पर उनने दो गोलियां उस आकृति पर दाग दीं, लेकिन उस आकृति पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा | वह छाया पास में बढ़ती आई और आकृति स्पष्ट दिखाई देने लगी | भयावह डरावना चेहरा,  बैठी हुई नाक, खुले हुए होठ, गंजा सिर, स्थिर और एक ही तरफ अपलक ताकती हुई आँखें, गड्ढों और झुर्रियों से भरे हुए गाल |

वह सोच न सका कि यह कौन है और क्या कर रहा है ? धीरे-धीरे वह आकृति पीछे हटने लगी और एक खंभे के पास पहुंचकर उसके ऊपर चढ़ने लगी | फ्रेंक ने निशाना बांधकर फिर दो गोलियां चलाई, पर वे लगी किसी को भी नहीं | यह सब देखकर फ्रेंक हाइब्स बुरी तरह डर गया और बंगले से निकलकर बेतहाशा भागने लगा | कुछ दूर भगाने पर वह एक चीख के साथ बेहोश होकर गिर पड़ा |

जब उसे होश आया तो देखा कि कुछ आदिवासी उसकी झाड़फूंक कर रहे हैं | स्वस्थ होने के बाद फ्रेंक हाइब्स ने आदिवासियों से डाक बंगले के प्रेत की बावत पूछताछ की तो इसुइंगुई लोगों ने बताया कि जिस जगह यह डाकबंगला बना है, इस स्थान पर पहले एक टीला था | इस टीले पर आदिवासियों के जू-जू देवता की पूजा होती थी और जानवरों तथा मनुष्यों की बलि (sacrificial) दी जाती थी | जब अंग्रेज आये तो उन्होंने इस स्थान की मूर्तियों को उठवाकर फिकवा दिया, नर बलि बंद करा दी और वहां एक डाक बंगला बनवा दिया |

इस कृत्य से उस क्षेत्र का देव पुरोहित (priest) बहुत बिगड़ा और अंग्रेजों के चले जाने के बाद उसने गांव वालों को इकट्ठा करके कहा कि डाक बंगले को जला दो और वहां फिर से देवताओं की पूजा शुरू करो | अंग्रेजों से भयभीत आदिवासी इसके लिए तैयार नहीं थे | निराश पुरोहित गुस्से में आकर उन्मत्त पागलों की तरह बड़-बड़ाता हुआ डाक बंगले के चारों ओर चक्कर लगाता रहा |

फिर एक रस्सी से वहीं बरामदे में फाँसी लगा कर मर गया | तब से अब तक पुरोहित का प्रेत (ghost) डाक बंगले में रहता है | कोई उधर जाने की हिम्मत नहीं करता, इससे पहले भी जब कोई अंग्रेज अफसर वहां आया और उसमें ठहरा तो पुरोहित के प्रेत ने उसे नहीं ठहरने दिया | फ्रेंक हाइब्स ने डाक बंगले के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी एकत्रित की और जब उसके भुतहे होने पर विश्वास हो गया तो भविष्य में किसी अफसर पर संकट न आये, यह ध्यान में रखते हुए फ्रेंक ने बंगले में अपने सामने आग लगवा दी |




कानपुर की सर्वाधिक धनी बस्ती काहू कोठी में एक ऐसी तिमंजली हवेली है जो पिछले लगभग 40 वर्षों से खाली पड़ी है | बताया जाता है कि सं 1642 में एक लोहा व्यवसायी ने इस हवेली को ख़रीदा जो इसके पहले काफी जीर्ण-शीर्ण हालत में था इस मकान को नए ढंग से बनवाने के लिए उक्त लोहा व्यवसायी ने मकान की नींव खुदवाई |

नींव खोदते समय एक कब्र (grave) निकली | लोगों ने कहा कि या तो मकान का निर्माण रोक दिया जाय अथवा उस कब्र को सम्मान के साथ उचित स्थान दिया जाय, मगर इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया गया और खुदाई जारी रखते हुए भवन का निर्माण यथावत चालू रखा | उस भवन के निर्माण कार्य के दौरान ही उक्त व्यवसायी और उनका एक पुत्र अकस्मात् चल बसे | कुछ दिनों बात मृत व्यवसायी का दूसरा लड़का भी मर गया | इन दिन मौतों के कारण भयभीत होकर सेठ की विधवा ने भवन बनवाने का विचार त्याग दिया |

इस अध-बने मकन में जो कोई भी आकर ठहरता है, बुरी तरह संतप्त होता है | प्रतीत होता है कि कोई प्रेतात्मा मकन में उसका ठहरना सहन नहीं कर पाती | अब तक जिस किसी ने भी इस मकान में रहने की कोशिश की है वह बुरी तरह परेशान होकर मकान छोड़ने के लिये बाध्य हो गया है |


कलकत्ता में जैसोर रोड पर स्थित क्लाइव हाउस भी इसी प्रकार के अभिशिप्त भवनों में से एक है ब्रिटिश राज्य के दिनों में यह इमारत लार्ड क्लाइव का निवास स्थान था | वास्तव में लार्ड क्लाइव का निवास तो फोर्ट विलियम क्षेत्र में था, वहीं से वह राजकाज निबटाया करता था | लेकिन ऐशो-आराम के लिए वह जैसोर रोड पर गोरा बाजार में स्थित इस इमारत में आया करता था |

इतिहास प्रसिद्ध प्लासी की लड़ाई लार्ड क्लाइव के शासन काल में ही हुई | इस लड़ाई में सिराजुद्दौला के बाद मीरजाफर को नवाब बनाया गया | मुर्शिदावाद के खजाने में बेशुमार हीरे, सोने के आभूषण और अशर्फियाँ थीं, जिन्हें लार्ड क्लाइव ने ले लिया | क्लाइव ने यह खजाना उक्त इमारत में ही कहीं गाढ़ दिया, बताया जाता था |

इस खजाने के बारे में क्लाइव ने ईस्ट इण्डिया कंपनी को कुछ भी नहीं बताया और जब वह इंग्लैण्ड गया तो खजाने को इस आशा में यहीं छोड़ गया कि फिर कभी वह इसे यहाँ से ले जाएगा | पर वह 'फिर कभी' वाला समय कभी आया ही नहीं, आया तो क्लाइव का अंत काल |

क्लाइव का वह खजाना इस ईमारत में कहाँ गढ़ा है, यह किसी को कुछ नहीं मालूम | स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस इमारत के कमरों में कई लोग आकार रहने लगे | इमारत में रहने वाले लोगों को कई बार रात में घोड़ों के टापों की आवाज सुनाई देती है और उसके साथ ही कुछ ऐसी आवाजें भी जिससे लगता है कि घुड़सवार अपने साथ हथियार आदि भी रखे हुए है | कई बार खाली पड़े कमरों में किसी महफिल के जमने, युवतियों के खिलखिलाने और हंसी-ठिठौली करती अंग्रेज आवाजें भी सुनाई देती हैं |

क्लाइव हाउस में कई बार औरतों के साथ मार-पीट करने और उनके चीखने-चिल्लाने की आवाजें भी सुनाई देती हैं | रात के सन्नाटे में कभी-कभी कत्थई रंग के घोड़े पर सवार फौजी वर्दी पहने कोई अंग्रेज अफसर भी दिखाई देता है, जिसके सिर के बाल उड़े हुए और खोपड़ी चमकती हुई दीखती है | छोटी-छोटी मूंछों और हलकी दाढी वाले, कमरे में तलवार लटकाये यह आकृति लार्ड क्लाइव की प्रेतात्मा बताई जाती है |


इस प्रकार की घटनाएं विक्षुब्ध आत्माओं द्वारा किये गए उत्पात ही प्रतीत होते हैं | ऊपर की घटना वाला पुरोहित प्रेत, टीला हटाने के कारण रुष्ट हुआ और उसे आक्रोश की स्थिति में ही आत्महत्या कर बैठा | मरने के बाद भी उसका रोष शांत नही हुआ और उद्विगत आत्मा उस टीले की जगह बने हुए डाकबंगले को अपनी प्रतिहिंसा का केंद्र बनाये रही |

मिश्र के पिरामिडों में बलि दिए गए मनुष्यों के चीत्कार जो प्रायः सुनाई पड़ते हैं, इतने उद्विग्न रहते हैं कि उन स्थानों को छेड़छाड़ करने वालों पर ही बरस पड़ते हैं और घातक हमले कर बैठते है | कब्रिस्तानों और मरघटों या शमशानों (graveyard and crematorium) में भी इसी प्रकार के उपद्रव घटित होते रहते हैं |



उपद्रव भूत-प्रेत प्रायः इसी स्तर की विक्षुब्ध और उद्विग्त आत्माएं हुआ करती हैं | मरते समय तथा उसके उपरांत मृत्यु स्थान पर धार्मिक वातावरण (religious environment) बनाने की उपयोगिता, महत्व धर्मशास्त्रों में इसलिए बताई गयी है कि उससे दिवंगत आत्मा को यदि कोई विक्षोभ रहा हो तो उसका समाधान होने से सद्गति प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके | अन्यथा विक्षोभ मारने के बाद भी चैन से नहीं बैठने देता |






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